बस्तर के एक लक्ष्यभेदी कलेक्टर : रजत बंसल



बस्तर के सर्वाधिक बुद्धिमान प्रशासकों में सर एम.व्ही. ग्रिगसन की गिनती होती है। बस्तर में अपनी पदस्थापना (1927 से 1931)  और आदिवासियों की तत्कालीन स्थिति पर उन्होंने एक किताब भी लिखा है। 1943 में लिखी गई इस किताब में बस्तर के विकास को लेकर उन्होंने एक रोड मैप तक प्लान किया था। 

प्रख्यात पत्रकार एवं सिने तारिका श्रीमती जया भादुडी  के पिता तरुण भादुड़ी ने टाइम्स ऑफ इंडिया के ब्यूरो चीफ रहते हुए  भोपाल से बस्तर की कई यात्राएं की थी। श्री भादुड़ी ने अपने लखनऊ तबादले के पहले एक बार इस स्तंभकार  से हुई चर्चा में साफ-साफ बताया था कि सर ग्रिगसन के अनुभवों का लाभ बस्तर के विकास की योजनाओं में लिया जाना चाहिए। बस्तर का समग्र विकास तभी संभव है। 

श्री भादुडी के अनुसार सन् 1943 में ग्रिग्सन ने लिखा था कि "किसी विवेकपूर्ण प्रशासन के लिए सिर्फ यह जरूरी नहीं है कि वह आदिवासियों को अपनी जीवन प्रणाली, अपने मूल्यों, नृत्य, गीतों या हंसी को खोए बिना आधुनिक संसार में अपनी जगह बनाए रखने के योग्य बनाए बल्कि यह भी जरूरी है कि वह आदिवासियों को भय, जरूरत और हस्तक्षेप से मुक्त कर स्वाधीन भारत जो कि होना ही है के विकास में विशेष योगदान करने के योग्य भी बनाए।"

पत्रकार तरुण भादुड़ी को बस्तर का सर्किट हाउस और उस जमाने का खानसामा इला बख्श के द्वारा बनाया जाने वाला चिकन बेहद पसंद था। अपनी बस्तर की यात्रा को वे किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं मानते थे। श्री भादुडी यह मानते थे कि बस्तर का विकास हो किंतु वे इस बात के लिए सहमत नहीं थे की आदिवासी संस्कृति को नष्ट कर बस्तर का  आधुनिकीकरण किया जाए। वे यह भी नहीं चाहते थे कि बस्तर विकास की दौड़ में पीछे छूट जाए और सदा- सदा के लिए अजायबघर होने का तोहमत झेले। खैर बात हो रही थी सर ग्रिगसन की। सर ग्रिगसन का मानना था कि "बस्तर का यदि विकास करना है तो वहां ऐसे अधिकारी भेजे जाये जो श्रेष्ठ नैतिकता वाले मालिक के रूप में नहीं बल्कि वास्तविक उपकारी और सेवक के रूप में  कार्य कर सकें।" 



हमें लगता है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने श्री रजत बंसल जैसे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी  को बस्तर में पदस्थ कर ग्रिगसन की भावनाओं का सम्मान किया है। यहां यह उल्लेख करना लाजमी होगा कि 73 वर्षों पूर्व बस्तर जिला के रूप में अस्तित्व में आया था। इसके उपरांत अब तक 122 प्रशासनिक अधिकारी बतौर कलेक्टर यहां अपनी सेवाएं दे चुके हैं। लेकिन इनमें आर. सी.वी.पी. नोरोन्हा जैसी ख्याति विरले को ही प्राप्त है। 

भारतीय प्रशासनिक सेवा के सन् 2012 बैच के अधिकारी श्री बंसल को इस मायने में अपवाद स्वरूप लिया जा सकता है।लगभग 35 वर्षों के इस युवा अधिकारी ने 29 मई 2020 को कोरोना जैसी महामारी के बीच बस्तर  का कार्यभार संभाला था।  दो वर्षों से भी कम समय में इस अधिकारी ने जो कर दिखाया है उसकी जितनी  तारीफ की जाए वह  कम है । प्रशंसा की वजह केवल शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन मात्र नहीं है अपितु इमानदार छवि और आम जनता से सीधा कनेक्ट होने की अद्भुत क्षमता श्री बंसल में व्याप्त है! शहरों की गलियों में साइकिल से घूम- घूम विकास कार्यों का जायजा लेना हो या फिर दूरदराज के किसी गांव में आदिवासियों के बीच रात  व्यतीत कर उनके सुख- दुख में सहभागी होना । 

यह उनके लिए वैसा ही है जिसकी आपेक्षा सर ग्रिगसन ने आजादी के पहले बस्तर में तैनात होने वाले किसी कलेक्टर से की थी। बस्तर भले ही अब सात जिलों में विभाजित हो चुका है और अफसरों की फौज यहां तैनात हो किंतु मिशन मोड में काम करने वाले अफसरों को उंगलियों में गिना जा सकता है। वैसे कांकेर के कलेक्टर चंदन कुमार एवं नारायणपुर के कलेक्टर ऋतुराज रघुवंशी भी इस  अंचल में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे हैं। लेकिन  श्री रजत बंसल जैसे लक्ष्यभेदी प्रशासक विरले ही पैदा होते हैं।