बस्तर : जहां देवी- देवताओं की भी अदालत में होती है पेशी

जगदलपुर। अपनी अनूठी संस्कृति के कारण देश ही नहीं विदेशों में भी बस्तर की एक अलग पहचान है। छत्तीसगढ़ राज्य के इस आदिवासी बाहुल्य अंचल में ऐसी- ऐसी  परंपराएं विद्यमान हैं जिन्हें देखकर आज भी लोग हैरत में पड़ जाते हैं। इन्हीं  परंपराओं में से एक है- भंगाराम जात्रा। 

भंगाराम जात्रा  वर्ष में एक बार भादो मास के कृष्ण पक्ष में पडने वाले पहले शनिवार को आयोजित किया जाता है। इस भंगाराम जात्रा  में लगभग पांच सौ देवी देवता आमंत्रित किए जाते हैं। कोंडागांव जिले के केशकाल तहसील मुख्यालय पर आयोजित होने वाले इस जात्रा रूपी मेले के क्षेत्राधिकार में नौ परगना के देवी- देवता आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस क्षेत्राधिकार के अंतर्गत पड़ने वाले गांवो की सुख- सुविधा दूसरे शब्दों में दैवी प्रकोपो से बचाने की जिम्मेदारी सम्बन्धित गांव के देवी - देवता की होती है। यदि सम्बन्धित गांव के  देवी- देवता ने  प्राकृतिक प्रकोपो से  संबंधित गांव की रक्षा करने में असमर्थ साबित हुआ तो उसे भंगाराम माई की अदालत में दंडित किया जा सकता है। सार्वजनिक रूप से आयोजित इस अदालत में ग्रामीणों की ओर से शिकायत की निष्पक्ष सुनवाई होती है ।नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का इस अदालत में पूरा-पूरा पालन भी किया जाता है। यदि अदालत में किसी देवी देवता के विरुद्ध शिकायत सही पाई गई तो उन्हें दंड के रूप में  कारागार की सजा तक दी जाती है। इन नौ परगनाओं में केशकाल, विश्रामपुरी तथा फरसगांव के ग्रामीण अंचल आते हैं।

इस वर्ष विगत 4 सितंबर 2021 को शनिवार के दिन भंगाराम जात्रा धूमधाम के साथ आयोजित किया गया। इस यात्रा में बड़ी संख्या में देवी- देवता शामिल भी हुए। अपने दायित्व का ठीक से निर्वाह नहीं करने वाले  देवी- देवताओं को सजा देने के लिए कारागार का निर्माण भी कराया गया।  समाज का ख्याल ठीक से नहीं  रखने वाले कुछ देवी- देवताओं को 

अदालत में दंडित भी किया गया।  पिछले वर्ष कोरोना महामारी के कारण भंगाराम  जात्रा  का आयोजन बेहद संक्षिप्त रूप में किया गया था किंतु इस वर्ष भंगाराम जात्रा में फिर रौनक देखी गई। जात्रा में बड़ी संख्या में पुजारी, गायता,  सिरहा, मांझी, मुखिया, पटेल व अन्य ग्राम प्रमुख सम्मिलित हुए। इस मेले की विशेषता यह है कि इसमें महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है। जात्रा के आकर्षण का केंद्र एक खान देवता भी होते हैं जिन्हें डॉक्टर खान देव के नाम से जाना जाता है। केशकाल के कुंवरपाठ  देव, लिहागांव के ललितकुंवर देव एवं ग्राम धनोरा के खंडा देव की भी जात्रा में काफी पूछ-परख होती है।  केशकाल क्षेत्र के निवासियों का कहना है कि वर्षों पूर्व एक बार  हैजा के प्रकोप के दरमियान एक खान चिकित्सक ने क्षेत्रवासियों की सेवा की थी। 

कई लोगों  की जान खान चिकित्सक  ने बचाई थी। कालांतर में इन्हे ही डॉक्टर  खान देव के नाम से जात्रा में मान्यता प्राप्त हो गई। यद्यपि इस  जात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि नौ परगना के देवी देवताओं की एक-एक करके  भंगाराम माई की अदालत में पेशी होती है। माई नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर अमल करते हुए दोषी देवताओं को सजा देकर दंडित करती हैं और अच्छा कार्य करने वाले देवताओं को सम्मानित भी। कुल मिलाकर देश में बस्तर का यह भंगाराम जात्रा ही एक ऐसा आयोजन होगा जिसमें देवताओं को भी पेशी भुगतनी पड़ती है और सजा के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।