कलेक्टर हो तो रजत बंसल जैसा



जगदलपुर | भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक दोहा है-लीक-लीक गाड़ी चलें, लीकहिं चले कपूत । लीक छाडि तीनहिं चलें - शायर, शेर, सपूत।

उक्त दोहा 2012 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रजत बंसल पर सटीक बैठता है। श्री बंसल पहले से खींची हुई लीक पर चलने के आदी नहीं है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे पुरानी लकीरें मिटा देते हैं। बहत्तर वर्षों पहले बस्तर में कलेक्ट्रेट की स्थापना की गई थी। एक जमाने में अविभाजित बस्तर जिले का क्षेत्रफल केरल राज्य से बड़ा होता था। इसलिए बस्तर में किसी कलेक्टर की पदस्थापना को काफी महत्वपूर्ण माना जाता था। बस्तर की पदस्थापना एक कलेक्टर के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हुआ करती थी क्योंकि यहां काम करने की संभावनाएं काफी ज्यादा थी। विशेष रूप से मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के जमाने में बस्तर को बेहद संवेदनशील माना जाता था। इस कारण चुने हुए अफसर बस्तर भेजे जाते थे। उद्देश्य साफ था। आदिवासी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखते हुए आदिवासियों का विकास करना।दूसरे शब्दों मेंआदिवासियों पर आधुनिक विकास की अवधारणा को शासन थोपे जाने के पक्ष में नहीं था।

इतना ही नहीं इस अवधारणा के पीछे कुछ आदिवासी नेताओं की सक्रियता किसी से छुपी हुई नहीं थी।बहत्तर वर्षों की अवधि में लगभग चालिस आईएएस अफसर बतौर कलेक्टर बस्तर में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इनमें से आज भी आरसीवीपी नोरोन्हा का नाम सर्वोपरि है। यही वजह है कि सुदूर दक्षिण- पश्चिम बस्तर में आदिवासियों ने स्वयं उनके नाम पर नारोन्हापल्ली नामक एक गांव बसा रखा है। नारोन्हा साहब की कार्यशैली विलक्षण थी।वे सच्चे अर्थों में प्रशासक थे। उनके बाद यदि राजमहल गोलीकांड की अवधि को छोड़ दिया जाए तो किसी कलेक्टर ने इतनी ख्याति राष्ट्रीय स्तर पर अर्जित नहीं की जितनी नारोन्हा ने ।

बतौर कलेक्टर डॉ ब्रह्मदेव शर्मा भी काफी लोकप्रिय हुए थे। शर्मा साहब ने बैलाडीला क्षेत्र के बड़े कमेली ग्राम में आदिवासी युवतियों का सामूहिक विवाह आयोजित करा कर काफी सुर्खियां बटोरी थी। दरअसल बैलाडीला क्षेत्र में उस जमाने में अफसर और ठेकेदार धन कमाने के बाद आदिवासी बालाओं की इज्जत आबरू से भी खेला करते थे। कई अफसर और ठेकेदार इन्हें अपनी रखैल तक बना लिया करते थे। शर्मा साहब को यह नागवार गुजरा। उन्होंने अपने स्तर पर पहले यौन शोषण की घटनाओं की पुख्ता जानकारियां इकट्ठा करनी शुरू की। डॉक्टर साहब की मंशा उनके मातहत अफसर तक ताड़ नहीं पाए थे। यदि उनकी योजना लीक हो गई होती तो संभव है खेल बिगड़ जाता। खैर, उन्होंने चुन-चुन कर उन अफसरों और ठेकेदारों को पकड़ा और आदिवासी युवतियों को घर में रखने वाले को उनकी व्याहता बनवा डाला। दंतेवाड़ा में एक महिला आश्रम भी खोला गया। यह आश्रम आदिवासी महिलाओं के लिए था जो ब्याह करने के पक्ष में नहीं थी।वैसे इस घटना के बाद कमला कांड भी उजागर हुआ। एच. मिश्रा जैसे दबंग आईएएस अफसर विवादों में आ गए थे। कमला पर फिल्म भी बनी थी। फिल्म बनने के पहले तत्कालीन भाकपा विधायक एवं आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा ने इस मुद्दे को मध्यप्रदेश विधानसभा में भी बढ़-चढ़कर उठाया भी था। मिश्रा साहब की खूब किरकिरी हुई थी।

लेकिन अंततः कमला मुंबई से बरामद कर ली गई और कुछ दिनों बाद उसकी मौत के साथ ही यह पूरा कांड दफन हो गया। लिखने का गर्ज यह की बस्तर में अपनी पदस्थापना को चुनौती के रूप में लेना और कुछ कर गुजरने का माद्दा रखना, ज्यादातर अफसरों के विवेक पर निर्भर करता है। अब इसका अर्थ यह नहीं कि ज्यादातर आईएएस अफसर निरंकुश और मनमानी कार्यशैली के आदी होते हैं।उस जमाने में भी राजनेताओं का अंकुश अफसरों पर हुआ करता था और आज भी है। बस्तर भी कभी इन राजनैतिक अंकुशो से निरापद नहीं रहा। एक किस्सा काफी मशहूर है । एक बार तत्कालीन मुख्यमंत्री डी. पी. मिश्रा बस्तर के दौरे पर आए। उस जमाने के कलेक्टर मोहम्मद अकबर से उन्होंने एक सवाल पूछा , सवाल था बस्तर में उनका आदमी कौन है? इस सवाल पर अकबर साहब बगले झांकने लगे।उनकी स्थिति ताड़ मुख्यमंत्री मिश्रा ने फिर जुबान खोली - तुम्हें यह नहीं मालूम कि बस्तर में मेरा आदमी कौन है, तो फिर तुम आईएएस कैसे बना गये? कलेक्टर अकबर के बगल में स्वर्गीय सूर्यपाल तिवारी खड़े थे। वे स्थानीय स्तर पर मुख्यमंत्री जी के खास आदमी माने जाते थे। श्री तिवारी की ओर इशारा करते हुए मुख्यमंत्री जी ने कहा - ये है मेरे आदमी और दूसरे हो तुम। दोनों को मिलकर बस्तर चलाना है। इसके बाद की कहानी सर्वविदित है। किस प्रकार राजमहल गोलीकांड की घटना घटित हुई और महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव जैसी राजनैतिक चुनौती को समाप्त करा दिया गया। आज भी ऐसे कई प्रसंग हैं। आईएएस अफसरों को कलेक्टरी करते हुए मुख्यमंत्री जी के समर्थकों का विशेष ख्याल रखना पड़ता है। वैसे अब पुराना बस्तर रहा नहीं। सात- सात जिलों में विभाजित हो चुका है।

इसलिए राजनीतिक चुनौतियां अफसरों के सामने जिले के क्षेत्रफलों की तरह विभाजित हो गई है। इसके बावजूद अफसरों को दबाव तो झेलना पड़ता होगा। इस दबाव के मध्य कुछ अफसर अच्छा खासा ग्राफ खींच जाते हैं। इनमें से एक यदि रजत बंसल को माना जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बेबाक, 32- 33 वर्ष का यह युवा अफसर सुबह से देर रात तक प्रशासन के ताने-बाने सुलझाते हुए देखा जा सकता हैं। देखकर सुखद आश्चर्य भी होता है।कभी-कभी तो पुरानी एंबेस्डर कार से दौरे पर निकल जाते है । अपने स्वास्थ्य के प्रति वे कितने सजग रहते हैं, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि व्यस्तता के बावजूद वे कुछ देर अपनी सरकारी कार के पीछे - पीछे जोगिंग करना नही भूलते।

असल में कार बंगले से पहले रवाना कर दी जाती है। फिर नियत स्थान पर कार खड़ी रहती है। जिस स्थान पर सरकारी कार खड़ी रहती है, उसके बाद वहां तक की दूरी कलेक्टर साहब दौड़ लगाकर पूरी करते हैं। रात में जब कड़कड़ाती ठंड में लोग घरों में दुबके रहते हैं, तब यहअफसर गरीबों के पास जाकर अलाव सेकने बैठ जाता है। उनका दु:ख दर्द जानने की कोशिश भी करते है। इतना ही नहीं गांव हो या शहर समान रूप से दौरे करना और पैनी नजर बनाए रखना श्री बंसल की अद्भुत काबिलियत है। रायपुर नगर निगम में रहते हुए, धमतरी के कलेक्टर के रूप में उन्होंने जो कुछ किया उससे कुछ अलग हटकर बस्तर में वे कर रहे हैं।

यदि कोरोना महामारी जैसी व्याधि व्याप्त नहीं हुई होती तो संभव है बस्तर में उनके पदस्थापना के के बाद के छ: महीने की अवधि और भी ख्याति बटोर रही होती। लगभग छः माह के कार्यकाल में गांव से शहर तक अपनी छाप छोड़ देना कोई कम बात है! बस्तर में पदस्थ होते ही अच्छे हैंड्स नहीं होने का रोना रोने वाले अफसरों को रजत बंसल जैसे युवा अफसर से सीख लेनी चाहिए। इस महामारी के दौर में वर्तमान व्यवस्था और विकास के कार्य किसी क्या किसी अच्छे हैंड्स के मोहताज हैं ? इस छोटी सी अवधि में जब समाज लाला जी को विस्मृत करने लगा था तब उन्होंने वाचनालय के नामकरण के बहाने ही उनकी अलख फिर से जगा दी। उनके इस आयोजन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बाद आज भी लालाजी के कद्रदान है।

ज्ञात हो कि लाला जी की खोज खबर शासन स्तर पर सर्वप्रथम मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने ली थी जिसके कारण उन्हें आजीवन सरकारी वजीफा प्राप्त होता रहा। यह सरकारी वजीफा उनके जीने का सहारा भले ही ना रहा हो किंतु लाला जी के चाहने वालों के लिए उनकी स्मृति में वाचनालय के नामकरण मात्र से आजीवन सहारा बना रहेगा। एक हिंदी फिल्म का संवाद श्री बंसल की कार्यशैली को देखकर बरबस जेहन पर झलक जाती है जिसमें महानायक अमिताभ बच्चन कहते हैं- मूछें हो तो नत्थू लाल की वरना ना हो! वाकई में कलेक्टर हो तो रजत बंसल जैसे वरना.....।